अल्लाह की किताबों का अक़ीदा

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मैं अकीदा रखता हूँ कि जो सहीफे पैगम्बरों पर नाज़िल हुए हैं, हक़ हैं । और उनकी तसरीह जिस तरह हदीसों से साबित है हक़ है । और वो सब एक सौ चार हैं । आदम पर दस, शीष पर पचास, इदरीस पर तीस, इब्राहीम पर दस । अलैहिमुस्सलाम
और चार किताबें जो चार पैगम्बरों पर हुईं हक़ हैं । ज़बूर हजरते दाऊद पर, तौरेत हजरते मूसा पर, इंजील हजरते ईसा पर और कुरआन हमारे पैगम्बर हजरत मुहम्मद मुस्तफा सलवातुल्लाहि अलैहिम अजमईन पर ।
कुरआन शरीफ ने उन सबको मंसूख किया यानी जिन बातों का हुक्म और जिनसे रोका गया है उन सहीफों या किताबों के खिलाफ कुरआन पाक में हैं वही नासिख हैं तमाम बातें मंसूख नहीं । जैसे हजरते याक़ूब की शरीअत में जो चोरी करता कुछ दिन तक जिसका माल होता उसकी गुलामी करता । कुरआन ने इस हुक्म को मंसूख किया कि जो मर्द या औरत चोरी करे उसके हाँथ काट डालो । (सूरह माइदा 28)
बाकी तीन किताबों में अहले किताब ने तबदीलियां कर दीं लेकिन कुरआन जैसा उतरा है और मुरत्तब किया गया है वैसा ही है और ऐसा ही रहेगा इसे बदलने की कुदरत किसी में नहीं और न उसकी तरह कोई बना सकता है । क्यूँकि अल्लाह ने फरमाया है कि हमने उतारा ज़िक्र को यानी कुरआन को और हम ही इसकी हिफाज़त करने वाले हैं । (सूरह हजर 9)
कुरआने करीम मखलूक का कलाम नहीं और इसकी हकीकत हुरूफ और आवाज़ से पाक है । खल्क़ को इन चीजों की जरूरत है, किसी कलाम को उन चीजों के बगैर अदा करना मुहाल है । कुरआन को भी इन्ही तीनों में समेट दिया गया है ।
अगरचे सरकार ने कलामे इलाही हज़रते जिबरईल के वास्ते के बगैर भी सुना है जिसको हदीसे कुदसी कहा जाता है मगर कलामे मजीद जो जिबरईल के जरिए उतरा है, अफज़ल है । इस वजह से कि इसमें अवामिर और नवाही की तफ्सील है और कुछ आयतें कुछ की नासिख हैं ।
ऐ अल्लाह कलम-ए-तय्यबा के सदके हम पर कुरआन के अनवार व बरकात नाज़िल फरमा ।

अक़ाइदुल अज़ीज़ (हज़रत शाह अज़ीज़ुल्लाह अज़ीज़ सफीपुरी)

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