रमज़ान हर बन्दें के लिए नेमत

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अल्लाह तआला फरमाता है : रमज़ान के महीने में कुरआन नाज़िल किया गया । (सूरह बकरा 185)
इस आयत में ग़ौर करने से मालूम होता है कि रमज़ान को तमाम महीनों में इस तरह भी फज़ीलत हासिल है कि इसमें कुरआन जैसी मुकद्दस किताब उतारी गई, इस एतबार से देखा जाए तो रमज़ान शरीफ तमाम मुसल्मानों के लिए अज़ीम नेमत की हैसियत रखता है ।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं :
रमज़ान का महीना आते ही जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं दोज़ख के दरवाजे बन्द कर दिए जाते हैं और शैतानों को ज़न्जीर में जकड़ दिया जाता है । (बुखारी शरीफ)
एक मोमिन बन्दे के लिए इससे बढ़ कर और क्या नेमत होगी कि उसको एक ऐसा महीना मिला जो रहमत, मग़फिरत और जहन्नम से छुटकारा हासिल करने का बेहतरीन ज़रिया है । इस महीने में बन्दा अल्लाह की रज़ा हासिल करने के साथ अपने पिछले गुनाहों को मआफ भी करा सकता है इस शर्त के साथ कि वो उसके तमाम हुक़ूक़ को अदा करे ।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इर्शाद फरमाते है :
जिसने ईमान के साथ रोज़ा रखा उसके पिछले गुनाह मआफ कर दिए जाते हैं । चुनांचे एक गुनहगार बन्दे के लिए गुनाहों की मग़फिरत से बढ़ कर नेमत और क्या हो सकती है । (बुखारी शरीफ)
बच्चों के लिए नेमत
रमज़ान में बच्चों को जहां ज़ाहिरी नेमतें, जैसे खाने पीने की चीज़े ज़्यादा मिलती हैं वही एक ऐसा प्लैटफार्म भी मिलता है जो मुस्तक़बिल में बच्चे के लिए आबे हयात की हैसियत इख्तियार कर लेता है, यानी उसे एक इस्लामी माहौल मिलता है अगरचे थोड़े वक़्त के लिए ही सही चूंकि रमजान में आम तौर पर मुसल्मान इस्लामी तरीके से ज़िन्दगी गुज़ारने की कोशिश करते हैं । नमाज़, रोज़ा और तरावीह की पाबन्दी के साथ झूठ, ग़ीबत, चुगली, बदकारी और बदफेली जैसे कामों से परहेज़ करते हैं इसी लिए ये सब देख कर बच्चों में भी नमाज़ और रोज़ा अदा करने का जज़्बा व शौक़ पैदा होता है और इस्लामी तरीक़े से ज़िन्दगी गुज़ारने का तरीका भी हासिल होता है ।
बचपन में अक्सर ये बात सामने आती है कि बच्चे अपने मां बाप से ज़िद करके रोज़ा रखते हैं, नमाज़ और तरावीह के लिए जाते हैं ये सारी चीज़े बच्चों की ज़िन्दगी में असर अंदाज़ होती हैं और उन्हें इस्लाम की तरफ खींचती हैं, इस एतबार से देखें तो रमज़ान बच्चों के लिए भी एक अज़ीम नेमत है बल्कि हकीकत तो ये है कि रमज़ान बच्चों के लिए एक काबिले कदर उस्ताद है जो उन्हे जीने का हुनर और सलीका सिखाता है अगर रमज़ान का मुबारक महीना न होता तो शायद इस लालची दुनिया में बच्चों को ऐसा हसीन माहौल देखने को नहीं मिलता और ना ही उन्हें इस्लामी निशानियों को पहचानने का मौका मिलता ।
नौजवानों के लिए नेमत
रमज़ान खास तौर पर नौजवानों के लिए कुछ ज़्यादा ही अहमियत का हामिल होता है क्योंकि वो इस महीने को अलग अलग तरीकों से इस्तेमाल करके आखिरत का सामान बना सकते हैं, इस लिए कि इस महीने में उनके पास आखिरत की तैयारी का ज़्यादा मौका मिलता है । रोज़ा रखने के अलावा बाल बच्चों और बीवी के फराइज़ निभाना, मां बाप के हुकूक अदा करना और पास पड़ोस और रिश्तेदारों की ज़रूरतों का ख्याल रखना वगैरा ।
नौजवानों के लिए सबसे बड़ी नेमत यूं है कि वह रोजे के ज़रिए अपने नफ्स पर काबू रखते हैं । चूंकि नफ्स इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है उस पर क़ाबू पाना कोई आसान काम नहीं, क्योंकि नफ्स ही एक ऐसी रुकावट है जो अल्लाह की इताअत करने और उसकी रज़ा हासिल करने से हमेशा रोकती रहती है । लेकिन अल्लाह ने अपने बन्दों को रोज़े की सूरत में एक ऐसा हथियार दे दिया है जो बहुत ज़्यादा सरकश नफ्स पर भी काबू पाने में मदद करता है ।
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम इर्शाद फरमाते है :
शैतान इंसान की रगों में खून की तरह दौड़ता रहता है तो भूख के ज़रिए शैतान की राह तंग करदो । (बुखारी शरीफ)
इस हदीस से ये भी मालूम हुआ कि रोजा न सिर्फ नफ्सानी ख्वाहिश को दूर करता है, बल्कि दुनिया परस्ती को दूर करके रूहानी ताकत बख़्शता है और ये सब रमज़ान जैसे मुबारक महीने की बरकत है ।
हज़रते सहल बिन अब्दुल्लाह तस्तरी अपने खादिमों से फरमाया करते थे कि जब तक तुम्हारा नफ्स गुनाह तलब करता है उसे भूख और प्यास के ज़रिए अदब सिखाओ फिर जब वो तुम से गुनाह की तलब न करे तो जो चाहे उसे खिलाओ और रात में जब तक चाहो उसे सोया रहने दो । (तब्काते कुबरा)
मालदार और सरमाया दार के लिए नेमत
जहां गरीब और मिस्कीन और इनके जैसे दूसरे लोग सिर्फ रोज़ा रख कर अल्लाह की रज़ा हासिल करते हैं वहीं दौलतमंद लोग रोज़ा के अलावा अल्लाह की राह में खर्च करके अल्लाह का कुर्ब हासिल कर सकते हैं, सदक-ए-वाजिबा यानी ज़कात के अलावा सदकाते नाफिला के ज़रिए आखिरत का तोशा जमा कर सकते हैं जैसे ज़्यादा से ज़्यादा रोज़ेदारों के लिए इफ्तार और सेहरी का इंतजाम करें और गरीबों, मिस्कीनों के खाने, पीने और दूसरी ज़रूरत की चीजें इकठ्ठा कराएं रमज़ान के महीने में जिस जगह तरावीह वगैरा का इहतमाम नहीं हो पाता वहाँ तरावीह और पांच वक़्त की नमाज़ का इंतजाम कराएँ और उसका खर्चा भी खुद बर्दाशत करें ताकि बहुत से वो लोग जो तरावीह से महरूम रह जाते हैं तरावीह अदा कर सकें इस तरह दोहरा सवाब पाने का मौका रमजान में मिलता है एक इंतजाम करने का दूसरा तरावीह की तरफ लोगों को माइल करने का इस तरह देखें तो रमज़ान नेमत ही नेमत है ।
गरीबों के लिए नेमत
ये महीना उन लोगों के लिए भी खास नेमत है जिस के पास खाने का सामान नहीं पहनने के लिए कपड़ा नहीं और रहने के लिए मकान नहीं इन तमाम चीजों का इंतजाम रमजान की बरकत से हो जाता है क्यूँकि अल्लाह तआला ने मालदारों पर जो जकात फर्ज़ किया है वो आम तौर पर रमजान ही में अदा किया जाता है इसी तरह आम रोजेदारों पर सदक-ए-फितर वाजिब करके गरीबों की खुशहाली का बेहतरीन सामान किया है ।
अल्लाह तआला इर्शाद फरमाता है :
सदकात गरीबों और मिस्कीनों के लिए है (सूरह तौबा 60)
यही वजह है कि जो गरीब और मिस्कीन आम दिनो में खुशी खुशी जिन्दगी नहीं गुज़ार पाते वो रमजान की बरकत और नेमत पाकर खुश नजर आते हैं।

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